वो लिखती थी

आज उसकी फटी से डायरी मेरे हाथ लगी 
पन्नो के बीच एक प्यारी लड़की मिली 
भावुक, सुन्दर – कभी एकदम  परेशां और कभी एक दम खुश 
फरवरी 13, 1984. 

 

वो लिखती थी
आँखों में जितने सपने थे
सब बिखेर देती
इस कदर लिखती
मानो शब्दों के पंख निकल आये हो

 

फिर अपनी मर्ज़ी से
बारिश करवाती
खूब तेज़ हवा चलवाती
सूखे-सूखे कागज़ पर
अपने भावनाओ  के फूल बनाती

 

कुछ पन्ने अब भी गिले है
उसकी शाही  से भीगे है
कभी एक आसू भी टपका था शायद
कैद है उसकी याद
कागज़ की नरमी में,
हाथ फेरो तो दिखेगा
तुम्हे भी वो एहसास

 

अपनी पहली लाल साडी,
कोई चटनी की रेसिपी ,
पति से हुई नोक झोक ,
या अपनी नयी ज़िन्दगी की क्यारी।

 

सब कैद कर ली थी
उस डायरी के,
पुराने पन्नो में

 

फिर वक़्त के साथ
वो डायरी भी
कही छुट गयी
हिसाब की लाल किताब ने जगह जो ले ली

 

अब भी वो लिखती है
पर उन पन्नो में अक्षर कम ही है
नंबर है
बाई  के एडवांस के
पति के पतलून से लेकर लड़के के नए बूट के
गैस cylinder का speed dial है
बड़ी लड़की का एड्रेस है
छोटी की शादी का plan..

 

वो अब भी लिखती है
फ़ोन पर बात करते करते
फूल बनाती है
कुछ आधा सा लिखा खवाब –
अनकही  सी बात,
पर
शब्दों में
अब कहा जान डालती है?

 

जान तो सारी
डाल दी
अपने बच्चो के अरमानो में
पति के खास कामो में
चोके  में
कमरे के रंगों में
उन  शब्दों से निकाल  कर
जान दाल दी
घर की दीवारों में

 

वो लिखती थी
जी हां
लिखती थी।

 

 

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2 thoughts on “वो लिखती थी

  1. वो लिखती थी, ये लिखती है कलम भले अलग हो, श्याही तो एक ही है!

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