शाम

अब शाम से कुछ 
डर सा लगता है।  
अब दिन ढलते 
मन कुछ थक-सा 
जाता है।  
शाम के आने पर 
अब वह सिसक सी 
नहीं लगती। 
अब वो 
आँखों में भी 
नमी नहीं जचती।  
अब तो बस दिन 
निकलता है 
रात आती है।  
शाम को थामने का 
मन नहीं 
करता।  
अब वो ज़िद्द 
नहीं होती 
न वो रोक टोक मिलती। 
अब जो जी में आता है,
मन वो 
कर ही देता है।  
अब न गीतों में 
शरारत है न 
शबादत हैं  दफ़न,
अब तो बस 
एक तरफ़ा 
यूँही हम गुनगुनाते है। 
अब शाम आने पे 
कोई महफ़िल 
नहीं लगती।  
अब वो बारिश 
भी कहा गर्म चाय 
की प्याली में होती है?
अब वो घर भी 
तो कही शाम में छुपा,
चुप-सा बैठा है,
अब वो ना 
बात करता है 
ना वो मुस्कुराता है। 
शाम से इसलिए 
मुझे डर सा 
लगता है।  
वो सूखे 
पौधे के दबे पल्लवो सा 
जीवन ये लगता है। 
 
अब तो बस बैठे है 
सुबह के 
सहारे,
थामले आकर,
तो शायद 
हम शाम से यु न हारे।  
**
IMG_3687
IMG_7840

13 thoughts on “शाम

  1. Bahot accha .. 👌👌👌👌शहमी हुई है झोपड़ी बारिश के ख़ौफ़ से,
    महलों की आरज़ू है कि बारिश तेज हो।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s