शाम

अब शाम से कुछ 
डर सा लगता है।  
अब दिन ढलते 
मन कुछ थक-सा 
जाता है।  
शाम के आने पर 
अब वह सिसक सी 
नहीं लगती। 
अब वो 
आँखों में भी 
नमी नहीं जचती।  
अब तो बस दिन 
निकलता है 
रात आती है।  
शाम को थामने का 
मन नहीं 
करता।  
अब वो ज़िद्द 
नहीं होती 
न वो रोक टोक मिलती। 
अब जो जी में आता है,
मन वो 
कर ही देता है।  
अब न गीतों में 
शरारत है न 
शबादत हैं  दफ़न,
अब तो बस 
एक तरफ़ा 
यूँही हम गुनगुनाते है। 
अब शाम आने पे 
कोई महफ़िल 
नहीं लगती।  
अब वो बारिश 
भी कहा गर्म चाय 
की प्याली में होती है?
अब वो घर भी 
तो कही शाम में छुपा,
चुप-सा बैठा है,
अब वो ना 
बात करता है 
ना वो मुस्कुराता है। 
शाम से इसलिए 
मुझे डर सा 
लगता है।  
वो सूखे 
पौधे के दबे पल्लवो सा 
जीवन ये लगता है। 
 
अब तो बस बैठे है 
सुबह के 
सहारे,
थामले आकर,
तो शायद 
हम शाम से यु न हारे।  
**
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12 thoughts on “शाम

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